छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति में कई ऐसे पर्व हैं जो केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि प्रकृति, स्वास्थ्य और सामाजिक एकता का संदेश भी देते हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण पर्व जुड़वास तिहार, जिसे कई क्षेत्रों में माता पहुंचनी के नाम से भी जाना जाता है।
यह पर्व गांवों में विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। लोग शीतला माता की पूजा कर परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और रोगों से सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं।
• कब मनाया जाता है?
जुड़वास तिहार सामान्यतः श्रावण मास में स्थानीय परंपराओं के अनुसार सोमवार या गुरुवार को मनाया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी तिथि में थोड़ा अंतर हो सकता है।
• कैसे मनाया जाता है?
इस दिन ग्रामीण और श्रद्धालु शीतला माता के स्थान की साफ-सफाई करते हैं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं।
• पूजा में मुख्य रूप से ये सामग्री अर्पित की जाती है—
हल्दी
तेल
चावल
नारियल
फूल
दीपक
श्रद्धालु माता से परिवार के स्वास्थ्य, सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।
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• धार्मिक मान्यता
लोकमान्यता है कि शीतला माता की पूजा करने से संक्रामक रोगों और महामारी से रक्षा होती है। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व का विशेष महत्व है।
हालांकि, यह एक लोकविश्वास है। स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए आधुनिक चिकित्सा, स्वच्छता और टीकाकरण भी उतने ही आवश्यक हैं।
• सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
जुड़वास तिहार केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का भी प्रतीक है।
• इस अवसर पर—
गांव के लोग मिलकर पूजा करते हैं।
साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
बच्चों और परिवार के अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है।
आपसी सहयोग और भाईचारे की भावना मजबूत होती है।
यही कारण है कि यह पर्व आज भी छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।
• प्रकृति और स्वास्थ्य से जुड़ा संदेश
जुड़वास तिहार हमें यह सीख देता है कि स्वस्थ जीवन के लिए स्वच्छ वातावरण, सामूहिक सहयोग और प्रकृति के प्रति सम्मान आवश्यक है। यह पर्व पारंपरिक मान्यताओं के साथ-साथ सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा भी देता है।
तेजी से बदलते समय में भी जुड़वास तिहार छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, स्वच्छता, स्वास्थ्य जागरूकता और लोकपरंपराओं के संरक्षण का भी संदेश देता है। नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से जोड़ने में ऐसे लोकपर्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।