झारखंड में छात्र आंदोलन की कवरेज पर अमन चोपड़ा हिरासत में, उठे बड़े सवाल—क्या सच दिखाना भी अब गुनाह है?
Monika••5 min read
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JHARKHAND : झारखंड में JPSC और JSSC से जुड़े मुद्दों को लेकर छात्रों का आंदोलन सोमवार को उस समय और ज्यादा सुर्खियों में आ गया, जब वरिष्ठ पत्रकार और एंकर अमन चोपड़ा ने दावा किया कि झारखंड पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ की। चोपड़ा के मुताबिक, वह छात्रों के आंदोलन और विधानसभा की ओर प्रस्तावित मार्च की कवरेज कर रहे थे। बाद में उनके खिलाफ FIR दर्ज किए जाने की बात भी सामने आई।
मामला अब केवल एक पत्रकार को हिरासत में लिए जाने तक सीमित नहीं रह गया है। इस घटना ने एक बड़ा लोकतांत्रिक सवाल खड़ा कर दिया है—क्या किसी आंदोलन की रिपोर्टिंग करना, छात्रों की आवाज जनता तक पहुंचाना और मौके की तस्वीर दिखाना पत्रकार के लिए परेशानी का कारण बन सकता है?
• छात्र सड़क पर क्यों उतरे?
झारखंड में JPSC और JSSC से जुड़ी भर्ती परीक्षाओं तथा नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर छात्रों में नाराजगी है। इसी मुद्दे को लेकर बड़ी संख्या में छात्र रांची में प्रदर्शन कर रहे हैं और विधानसभा की ओर मार्च करने की कोशिश कर रहे थे।
ऐसे समय में मीडिया की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। लोकतंत्र में जब हजारों छात्र अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरते हैं, तो देश के बाकी लोगों को यह बताने की जिम्मेदारी पत्रकारों की होती है कि आखिर प्रदर्शन क्यों हो रहा है, छात्रों की मांग क्या है और जमीन पर प्रशासन की क्या स्थिति है।लेकिन इसी कवरेज के दौरान अमन चोपड़ा को पुलिस द्वारा पूछताछ के लिए ले जाने की खबर सामने आई।
India Today की रिपोर्ट के मुताबिक, अमन चोपड़ा ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो के माध्यम से दावा किया कि उन्हें रांची में नाश्ता करते समय पुलिस ने अपने साथ चलने को कहा और लगभग दो घंटे तक पूछताछ की। चोपड़ा का कहना है कि वह छात्रों के प्रदर्शन और विधानसभा मार्च की रिपोर्टिंग कर रहे थे।
यह दावा सामने आने के बाद सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक पत्रकार को आंदोलन की रिपोर्टिंग से संबंधित मामले में हिरासत में लेने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
अगर पुलिस के पास कोई कानूनी आधार था, तो उसे स्पष्ट रूप से सार्वजनिक किया जाना चाहिए। और अगर पत्रकार ने कानून तोड़ा है, तो कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन लोकतंत्र में यह भी जरूरी है कि पत्रकारिता करने और कानून तोड़ने के बीच की रेखा साफ रहे।
• क्या अभिव्यक्ति की आजादी पर बड़ा सवाल?
भारत का लोकतंत्र केवल चुनावों से मजबूत नहीं होता। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिक सवाल पूछ सकें, छात्र अपनी मांग रख सकें और पत्रकार उन सवालों को जनता तक पहुंचा सकें।
यही वजह है कि अमन चोपड़ा के मामले ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारिता की आजादी को लेकर बहस तेज कर दी है।
अगर किसी पत्रकार की रिपोर्टिंग गलत है, तो उसका जवाब तथ्यों से दिया जा सकता है। अगर रिपोर्ट में कोई गलती है, तो उसका खंडन किया जा सकता है। अगर किसी कानून का उल्लंघन हुआ है, तो कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। लेकिन लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह होगी जब पत्रकार कैमरा उठाने से पहले यह सोचने लगे कि “अगर मैंने यह सच दिखाया तो मेरे साथ क्या होगा?”
झारखंड का छात्र आंदोलन केवल राजनीतिक बहस का विषय नहीं है। हजारों युवाओं का भविष्य भर्ती परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों से जुड़ा हुआ है। युवाओं के मन में अगर परीक्षा प्रक्रिया, नियुक्ति या प्रशासन को लेकर सवाल हैं, तो उनका समाधान संवाद से होना चाहिए।
सरकार और प्रशासन के पास कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी जरूर है, लेकिन उसी के साथ प्रदर्शनकारियों की आवाज सुनना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है।
छात्र सवाल पूछें तो जवाब दीजिए।
पत्रकार सवाल पूछे तो जवाब दीजिए।
कैमरा सच्चाई दिखाए तो सच्चाई सामने रखिए |यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।
पत्रकार की विचारधारा नहीं, पत्रकारिता का अधिकार महत्वपूर्ण
अमन चोपड़ा को लेकर सोशल मीडिया पर लोगों की राय बंटी हुई है। कुछ लोग उनकी पत्रकारिता का समर्थन करते हैं तो कुछ लोग उनकी रिपोर्टिंग और शैली की आलोचना करते हैं।लेकिन यहां एक मूल बात को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
किसी पत्रकार की विचारधारा पसंद या नापसंद होना और उसके पत्रकारिता करने के अधिकार का सवाल—दो अलग चीजें हैं। आज अगर किसी ऐसे पत्रकार के साथ कार्रवाई होती है जिसे हम पसंद नहीं करते और हम चुप रहते हैं, तो कल वही सवाल किसी दूसरे पत्रकार के सामने खड़ा हो सकता है। लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता की रक्षा केवल पसंदीदा पत्रकारों के लिए नहीं, बल्कि असहमति रखने वाले पत्रकारों के लिए भी होनी चाहिए।
•FIR से बढ़ी बहस
अमन चोपड़ा ने अपने बयान में FIR दर्ज किए जाने की बात भी कही है। मीडिया रिपोर्टों में भी उनके खिलाफ FIR की जानकारी सामने आई है। हालांकि FIR में लगाए गए आरोप और पुलिस का आधिकारिक पक्ष इस पूरे मामले को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
अगर किसी पत्रकार को केवल रिपोर्टिंग करने के कारण निशाना बनाया गया है, तो यह निश्चित रूप से गंभीर लोकतांत्रिक चिंता का विषय होगा।
सवाल अमन चोपड़ा से आगे का है आज मामला अमन चोपड़ा का है लेकिन असली सवाल इससे बड़ा है।
क्या भारत में पत्रकार किसी आंदोलन की ग्राउंड रिपोर्ट बिना डर के कर सकता है?
क्या कोई पत्रकार पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठा सकता है?
क्या छात्र आंदोलन की वास्तविक तस्वीर कैमरे में कैद की जा सकती है?
क्या सरकार और प्रशासन से असहज सवाल पूछना पत्रकारिता का अधिकार बना रहेगा?
इन सवालों का जवाब केवल सरकार या पुलिस को नहीं, बल्कि पूरे समाज को देना होगा क्योंकि लोकतंत्र में सवालों से डरने की नहीं, सवालों का जवाब देने की जरूरत होती है।
'सच दिखाने की सजा?'—देश पूछ रहा है सवाल
अमन चोपड़ा के हिरासत में लिए जाने और FIR की खबर के बाद सबसे बड़ा सवाल यही हैं अगर पत्रकार आंदोलन की रिपोर्टिंग करेगा और उसके बाद उसे पुलिस पूछताछ का सामना करना पड़ेगा, तो क्या इससे भविष्य में पत्रकारों के बीच डर पैदा नहीं होगा?
यह सवाल किसी एक पत्रकार के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। यह सवाल पत्रकारिता की स्वतंत्रता का है।
यह सवाल लोकतंत्र में असहमति की जगह का है। और सबसे बढ़कर यह सवाल है कि क्या सत्ता से सवाल पूछने की कीमत इतनी बड़ी हो सकती है कि पत्रकार कैमरा उठाने से पहले सौ बार सोचे?
लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संस्थाएं और अधिकार लंबे समय तक समाज की दिशा तय करते हैं। इसलिए जरूरी है कि छात्र आंदोलन हो या कोई दूसरा जनआंदोलन—कानून-व्यवस्था भी बनी रहे और पत्रकारिता की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे। क्योंकि लोकतंत्र में अगर सवाल बंद हो गए, तो जवाब भी धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगे।
अमन चोपड़ा का मामला अब सिर्फ एक पत्रकार की हिरासत का मामला नहीं रहा। यह सवाल बन चुका है